थॉमस अल्वा एडिसन का जीवन परिचय | Thomas Alva Edison Biography in Hindi

 

नमस्कार दोस्तों स्वागत हैं आपका हमारे इस नए लेख में आज हम आपको बताएंगे थॉमस अल्वा एडिसन का जीवन परिचय (Thomas Alva Edison Biography in Hindi) के बारे में!

दोस्तों हम सभी को अपने जीवन में एडिसन जी के जीवन के संघर्ष से जरूर प्रेरित हों चाहिए क्योंकि थॉमस अल्वा एडिसन जी ने ही लाइट बल्ब का अविष्कार किया था। थॉमस अल्वा एडिसन का जीवन परिचय को इतिहास के सबसे दिग्गज वैज्ञानिकों कि सूची में गिना जाता है। चलिए जानते हैं थॉमस अल्वा एडिसन का जीवन परिचय (Thomas Alva Edison Biography in Hindi)

थॉमस अल्वा एडिसन का जीवन परिचय (Thomas Alva Edison Biography in Hindi)

” माँ ! एडेल्ड ब्वॉय का क्या अर्थ है ? ” ” पागल , मूर्ख लड़का । ” ‘ और नॉट नार्मल का क्या अर्थ है ? ” “ जो सामान्य न हो , यानी सनकी हो । ” माँ ने कहा , फिर वह झुंझलाकर बोली ” लेकिन थॉमस , तुम आज ये ऊलजलूल सवाल क्यों कर रहे हो ? किसने बताए ये शब्द ? ” ” स्कूल के प्रिंसिपल ने मेरे लिए ये शब्द कहे हैं माँ ! “

“ क्या ? ” आश्चर्य से माँ ने पूछा , ” मेरे बेटे के लिए उन्होंने ऐसे अपमानजनक शब्द कहे , चलो , मैं तुम्हारे प्रिंसिपल से बात करूँगी । और माँ थॉमस को लेकर स्कूल पहुँची । उन्होंने प्रिंसिपल को खूब फटकारा कि बच्चों से इस तरह का व्यवहार किया जाता है ? जाते – जाते उन्होंने कहा— “ देख लेना , एक दिन मेरा बेटा , सारी दुनिया में अपना नाम करेगा और तुम्हें कोई नहीं जानेगा । ” माँ की यह भविष्यवाणी थॉमस अल्वा एडीसन के बारे में तत्काल सच न हुई हो , किंतु एक समय ऐसा आया कि सारे विश्व में एडिसन का नाम विख्यात हो गया ।

दो साल बाद , एडिसन ने देखा कि कांच के एक गोलनुमा बर्तन में , जले हुए धागे का टुकड़ा चालीस घंटे तक चमकता रहा । एडिसन ने इस बारे में अनुसंधान किया और बिजली के बल्ब को व्यावसायिक रूप से बेचने के लिए तैयार कर लिया । लेकिन काम यहीं नहीं रुका – एडिसन ने बिजली का प्रवाह बनाए रखने के लिए डायनुमो बनाया । बिजली को अलग – अलग घरों तक पहुँचाने की पूरी विधि तैयार की और यहाँ तक कि एक केन्द्रीय ‘ पावर हाउस ‘ भी निर्मित कर डाला । 

जब यह काम पूरा हो गया तो नववर्ष का दिन आया । एडिसन ने सारी सड़क को बल्बों से सजाया । इस महान् आविष्कार को देखने के लिए विश्वभर के पत्रकार आए थे । सन् 1887 में एडिसन ने एक और प्रयोगशाला खोल ली । उनकी प्रयोगशालाओं से एक के बाद एक , मानव – सुविधा के आविष्कार होते जा रहे थे । इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था— चलचित्र कैमरा । इसके अलावा टाइपराइटर का बुनियादी ढाँचा एडिसन ने ही तैयार किया था । उसने करीब ढाई हजार वस्तुओं का आविष्कार किया ।

थॉमस अल्वा एडिसन का जन्म मिलान , अमेरिका में 11 फरवरी , 1847 को हुआ था । बचपन से ही उसे हर वस्तु के बारे में जानने की उत्सुकता रहती । यह क्यों हुआ , कैसे हुआ ? वह स्वयं प्रयोग करके देखता और तब संतुष्ट होता । स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा अपमानित किए जाने पर जब उनकी माँ ने उसे फटकार लगाई तो उसका एक बुरा परिणाम यह हुआ कि एडिसन को स्कूल से निकाल दिया गया । एडिसन की उम्र उस समय दस वर्ष की थी । उसकी माँ स्वयं अध्यापन कार्य करती थी ।

 इसलिए उसने एडिसन को घर पर ही पढ़ाना शुरू किया । अपनी प्रतिभा और लगन के कारण बालक एडिसन हर बात को बहुत जल्दी ग्रहण करता था । उसने अपने घर के तहखाने में एक प्रयोगशाला भी बना ली । खाली समय में वह इसी तहखाने में काम करता था । एडिसन जब पंद्रह वर्ष का हुआ तो उसे अपने प्रयोगों के लिए अधिक धन की आवश्यकता हुई । पर धन आता कहाँ से ? परिवार तो इतना सम्पन्न न था ।

 इसलिए उसने ग्रैंड ट्रंक रेलवे में अखबार , टाफियाँ आदि बेचना शुरू कर दिया । जब उसके पास खाली समय होता तो वह सार्वजनिक पुस्तकालय में विज्ञान संबंधी पुस्तकें पढ़ता और नए – नए प्रयोगों तथा आविष्कारों के बारे में सोचता । धीरे – धीरे उसने रेलगाड़ी के डिब्बे में चलती – फिरती प्रयोगशाला खोल ली ।

सन् 1861 में उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ गया । लोगों को युद्ध के समाचार जानने की जल्दी रहती । तब एडिसन के मन में एक ऐसा समाचार पत्र निकालने का विचार आया जो रेल यात्रियों की जरूरत पूरा कर सके । संयोगवश उसे सस्ते दामों में एक छापने की पुरानी मशीन मिल गई । 

बस एडिसन ने उसे रेल के डिब्बे में ही रख लिया । वह खुद ही समाचार लिखता , कंपोज करता और अखबार छापता । उसका नाम रखा था— ‘ ग्रैंड ट्रंक हेराल्ड ‘ । बड़ी जल्दी ही उसका अखबार चल पड़ा । करीब चार सौ प्रतियाँ रोज बिक जातीं । दुनिया का यह पहला अखबार था जो चलती ट्रेन से प्रकाशित किया जा रहा था । लंदन के प्रसिद्ध अखबार ‘ टाइम्स ‘ ने भी इस अखबार की प्रशंसा में टिप्पणी लिखी थी । एक दिन एडिसन ट्रेन से उतरकर अखबार बेच रहा था । 

अचानक उसका ध्यान कहीं और चला गया और ट्रेन चल दी । एडिसन ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ा । तभी रेलवे के एक आदमी ने उसके दोनों कान पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया , क्योंकि चलती गाड़ी पकड़ने में जान को खतरा था । एडिसन उस वक्त गिरने से तो बच गया । पर तब से उसे सुनाई देना कम हो गया और धीरे – धीरे वह बहरा हो गया । रेलगाड़ी के डिब्बे में एडिसन छपाई मशीन के अलावा , प्रयोगशाला का सामान भी रखता था । एक दिन उसने फॉस्फोरस लाकर रख दिया । 

अचानक उस फॉस्फोरससे ट्रेन के डिब्बे में आग लग गई । गाड़ी रुकी और तुरंत आग बुझा दी गई । पर रेल अधिकारी एडिसन पर बहुत गुस्सा हुआ और उसका अखबार बेचना बंद करा दिया । उन्हीं दिनों एक अन्य घटना हुई । रेल की पटरियों के पास स्टेशन मास्टर का छोटा – सा लड़का खेल रहा था ।

उसे क्या पता था कि रेलगाड़ी आ रही है । आसपास के लोग भी रेलगाड़ी पर ध्यान लगाए थे । अचानक एडिसन ने उस बच्चे को देखा । उसने अपनी जान पर खेलकर बच्चे को उठा लिया और दूर जा गिरा । पल भर की देर होने पर बच्चे की जान जा सकती थी । सब लोगों ने एडिसन के साहस की प्रशंसा की ।

 जब इस घटना के बारे में स्टेशन मास्टर को मालूम हुआ तो उसने एडिसन को धन्यवाद देते हुए कहा— “ कृपया बताएँ कि मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ , ताकि आपके इस उपकार से उऋण हो सकूँ ? ” एडिसन ने कहा – “ मैं टेलीग्राफी सीखना चाहता हूँ । क्या आप मुझे सिखा सकते हैं ? ” स्टेशन मास्टर ने उसका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया । कुछ ही दिनों में एडिसन ने यह काम सीख लिया । इस कारण उन्हें एक स्टेशन पर टेलीग्राफ आपरेटर की नौकरी भी मिल गई । 

पर वह तो अपने प्रयोगों और आविष्कारों की धुन में मस्त रहते थे । भला नौकरी में क्या मन लगता ? एक दिन काम में लापरवाही करने के कारण नौकरी से निकाल दिया गया । अब एडिसन अपनी ही टेलीग्राफ मशीन बनाने में जुट गए । वह दिन गरीबी के थे । किसी ने सुझाव दिया कि तुम्हें न्यूयॉर्क जाना चाहिए । वहीं तुम्हारे काम का सच्चा मोल होगा । एडिसन न्यूयॉर्क चले आए । यहाँ उन्होंने अपने – आप बनाई टेलीग्राफ मशीन ‘ न्यूयॉर्क टेलीफोन एक्सचेंज ‘ के अध्यक्ष को भेंट की ।

 उन्हें आशा थी कि इसके लिए हजार डालर का पुरस्कार मिल जाएगा । पर उन्हें इसके लिए चालीस हजार डालर मिले तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा । बस फिर तो उन्होंने न्यूजर्सी के मैनलो पार्क में एक प्रयोगशाला खोली और अपने अनुसंधानों में जुट गए । अब तक लोग एडिसन को दीवाना समझते थे । वे सोचते थे कि यह व्यक्ति जो कुछ करना चाहता है , वह सिर्फ एक सपना है । एडिसन भी अपनी धुन के पक्के थे । उन्हें अपने कपड़ों तक का खयाल न रहता था कि वे धुले हैं या मैले । 

अपनी सारी आमदनी पुस्तकें खरीदने और प्रयोगशाला का सामान खरीदने में खर्च कर देते । न्यूजर्सी की प्रयोगशाला और फैक्ट्री में उन्होंने तीन सौ कर्मचारियों को नौकर रखा था । इसके बाद से एडिसन के आविष्कारों का सिलसिला शुरू हुआ । सबसे पहले सन् 1877 में ग्रामोफोन बनाया । इसमें एक सिलिंडर पर आवाज रिकॉर्ड होती थी । इसे हाथ से घुमाकर चलाते थे । यह एक इतिहास का विषय है कि ग्रामोफोन पर एडिसन द्वारा रिकॉर्ड किए गए पहले शब्द थे— ‘ मेरी हैड ए लिटिल लैम्ब ‘ और फिर ग्रामोफोन से यही आवाज एडिसन को मनायी थी । 

एडिसन अथक परिश्रम करते थे । हर रोज अठारह – उन्नीस घंटे काम करना सामान्य बात थी । लेकिन वह नियम से भोजन करते थे और नियम से सोते थे । वह अपनी सफलता का रहस्य बताते थे— ” मेरी सफलता का रहस्य यह है कि मेरे काम करने के कमरे में कोई घड़ी न थी ।

” एडिसन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनमें अटूट धैर्य था । वह कह थे— “ तुम जिसे पाना चाहते हो , उसे दृढ़संकल्प लेकर खोजो , तुम्हें अवश्य मिलेगी । ” वह असफलता से न घबराते थे और न निराश होते थे । एक बार उनकी प्रयोगशाला और फैक्ट्री में आग लग गई । 

बीस लाख डालर मूल्य की सामग्री के साथ तमाम आविष्कारों के जरूरी दस्तावेज भी जल गए । जब एडिसन का बेटा जलती हुई फैक्ट्री को देखकर आँसू बहा रहा था , एडिसन ने आकर कहा- ” अपनी माँ को बुला लाओ ऐसा दृश्य जीवन में शायद ही देखने को मिले । ” अगले दिन एडिसन ने फैक्ट्री के कर्मचारियों से कहा— “ अच्छा हुआ , ईश्वर ने हमारी गलतियाँ जला दीं , हम फिर से काम शुरू करेंगे ।

” यह घटना एडिसन के धैर्य एवं साहसपूर्ण व्यक्तित्व का परिचय देती हैं । एडिसन की इन तमाम सफलताओं के साथ एक बात आश्चर्यजनक यह है कि वह जीवन भर बहरे रहे और तब भी इतने सारे आविष्कार कर डाले । उन्हें तमाम पुरस्कार मिले थे । नोबेल पुरस्कार उन्हें भौतिकी विषय के लिए सन् 1915 में मिला था । एडिसन विनम्र स्वभाव के थे । बड़ी शांति से अपना काम करते थे । 

वह अपनी सफलता के लिए सदैव अपनी माँ को धन्यवाद दिया करते थे । वह कहते थे— “ मेरी उन्नति का कारण मेरी माँ है । मैंने संकल्प किया था कि मैं उन्हें निराश नहीं करूंगा । उनकी मेरे प्रति कितनी सच्ची भावना थी , कितना अधिक विश्वास था । मैंने अनुभव किया कि कोई ऐसा व्यक्ति तो है जिसके लिए मुझे जीवित रहना है । उसकी स्मृति मेरे आजीवन सतत आशीर्वाद सदृश है । 

” अपने जीवन के अंतिम दिन – 18 अक्टूबर , 1931 तक वह आविष्कार के काम में जुटे रहे । उनके सभी आविष्कार विश्व की मानवता के कल्याण को समर्पित थे । इसे विज्ञान जगत् उनके वरदान के रूप में स्वीकार करता है । अमेरिका ने अपने इस पुत्र पर सदा गौरव अनुभव किया है , क्योंकि उसकी प्रयोगशाला ने सारी दुनिया का दृश्य बदल दिया ।

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