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Leonardo da vinci Biography in hindi – लिओनार्दो दा विंची 2022

Leonardo da vinci Biography in hindi:- फ्लॉरेंस ( इटली ) एक आया जिसके हाथ में एक पहाड़ी है । एक दिन यहां सुनहरे बालोंवाला एक नौजवान था । पिंजरे को उसने खोला और पिंजरे में बन्द परिन्दों को आसमान में छोड़ दिया । परिन्दे खुली हवा में तैरते गए । हमारा नोजवान उन्हें बड़े ध्यान से देखता रहा ।

जो कुछ लियोनार्दो दा विची ने देखा उसके वह नोट्स लेता गया । वह परिन्दों को देख भी इसी से लिए रहा था । क्योंकि उसे यह यकीन हो चुका था कि हवा में उड़ने के जो कुछ भी नियम हो सकते हैं वे आदमी के लिए और परिन्दों के लिए एक से ही होने चाहिएं ।

वह अपने नोट्स उल्टी लिखावट में ले रहा था कि कहीं किसी और के हाथ न आ जाएं । इटली में पहले से ही बहुतों का ख्याल बन चुका था कि लियोनार्दो पागल है और लियोनार्दो भी नहीं चाहता था कि वह किसी तरह भी जले पर नमक छिड़कने की एक गलती और कर जाए । आदमी उड़ने लगे ? नामुमकिन ।

Leonardo da vinci Biography in hindi

कितने ही इतिहासकारों का मत है कि लियोनार्दो दा विची अपने युग का सबसे वड़ा परीक्षणशील वैज्ञानिक था , और यह तो सभी मानते ही हैं कि उसकी गणना मानव इतिहास के श्रेष्ठतम कलाकारों में होनी चाहिए । चित्रकला में उसकी इस प्रसिद्धि का आधार दो चित्र माने जाते हैं- ‘ लास्ट – सपर ‘ और ‘ मोनालीसा ‘ ।

कितने ही विश्वविख्यात चित्र वह अपने पीछे छोड़ गया और इनके अतिरिक्त , 5000 से अधिक बड़े छोटे – छोटे अक्षरों में लिखे हुए सचित्र पृष्ठ भी जिनमें जो कुछ प्रत्यक्ष उसने किया और उन प्रत्यक्षों के आधार पर जितने भी आविष्कार ( सभी तरह के ) उसे सुभे , उनकी रूपरेखा अंकित है । जो भी उसने जिन्दगी – भर में लिखा , शीशे पर अवस की शक्ल में उल्टी लिखावट में ही लिखा ताकि वह लोगों की निगाह से बचा रह सके । लियोनार्दो दा विची एक आविष्कारक था ।

वह एक सिविल इंजीनियर , सैनिक इंजीनियर , ज्योतिविद , भूगर्भ शास्त्री और शरीर – शास्त्री था । और साथ ही , शायद , वह दुनिया का पहला हवाबाज भी था । उसका हर क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं , एक विशेषज्ञ के समान पूर्ण अधिकार था । सर्वप्रथम वह एक कलाकार था , और कला के माध्यम से ही उसने विज्ञान में प्रवेश किया , और उसके वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी सम्भवतः उसकी कला को चार चांद और लगा दिए । लियोनार्दो का जन्म १४५२ में , इटली के प्रसिद्ध शहर फ्लॉरेंस के निकट विची गांव में हुआ था ।

Leonardo da vinci Biography in hindi

उसका पिता गांव का एक अफसर था , और मां विंची की ही किसी सराय में कभी नौकरानी रही थी । विची का बचपन अपने दादा के घर में बीता । स्कूल से ही लियोनार्दो की प्रतिभा सामने आने लग गई थी जबकि गणित को मुश्किल से मुश्किल समस्याओं का समाधान वह चुटकियों में ही कर देता था । और इसी समय से ही चित्रकला में उसकी अद्भुत शक्ति भी अभिव्यक्ति पाने लगी थी ।

सोलह साल की उम्र में आन्द्रेआ देल वेर्रोचिओ के यहां वह एपेण्टिस हो गया , और उसकी छत्रछाया में लकड़ी , संगमरमर , तथा अन्यान्य धातुओं पर शिल्पकारी करना सीख गया । वेर्रोचिओ अपने शिष्य की अद्भुत योग्यता से प्रभावित हुआ और उसने लियो नादों को प्रेरित किया कि वह लेटिन और ग्रीक के गौरव ग्रंथों का स्वाध्याय करे और दर्शन , गणित तथा शरीर विज्ञान में दक्षता प्राप्त करे ।

वेरोंचिओ का विचार था कि एक सच्चा कलाकार बनने के लिए इन ग्रंथों और विषयों का स्वाध्याय आवश्यक है । छब्बीस वर्ष की आयु में कहीं लियोनार्दो की यह शागिर्दी समाप्त हुई , जिसके बाद वह ‘ कलाकार संघ ‘ का सदस्य बन गया । अब वह पूर्णतः स्वतन्त्र था कि उसकी कला के भी अपने ही प्रशंसक हों , अपने ही पारखी हों । संघ की छत्रछाया में उसने संगीत वाद्यों में एक नया परीक्षण किया ।

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घोड़े के सिर की शक्ल में एक वीणा आविष्कृत की जिसके दांतों में यह विशेषता थी कि वे संगीत के स्वरों का यथेष्ट ‘ संकलन ‘ कर सकते थे । इस वीणा से ड्यूक लूदोविको स्फोर्ज़ा , जो उन दिनों मीलान का राजा था , लियोनादों की ओर आकृष्ट हो गया । के इटली उन दिनों कितनी ही छोटी – छोटी रियासतों में बंटा हुआ था जिनमें आए दिन कोई न कोई झड़प हो जाती ।

लियोनार्दो दा विची का ध्यान परिणामतः युद्ध लिए उपयोगी सामग्री के निर्माण की ओर गया । और , ड्यूक की नौकरी करते हुए , उसने के नये शहर वसाने की योजना – सी भी बनाई कि वह प्लेग की महामारी से तंग आए शहरों को कुछ मुक्ति दिला सके ।

उसकी योजनाओं में शहर की गन्दगी को नालियों द्वारा दूर ले जाने की व्यवस्था का महत्त्व भी स्पष्ट है । कितनी ही योजनाएं उसने ड्यूक सामने पेश की लेकिन मालिक को शायद उनमें कोई भी पसन्द नहीं आई , सो , ड्यूक के लिए वह एक सुन्दर चित्र ‘ दि लास्ट सपर ‘ ही प्रस्तुत कर सका जिसे सान्ता मारिया की रिफेक्टरी को पेश करने के लिए बनाने का उसे हुक्म खुद ड्यूक ने दिया था ।

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मीलान में रहते हुए उसकी अभिरुचि ‘ शरीर – रचना – विज्ञान ‘ ( एनाटमी ) में जाग उठी । उस जमाने के मशहूर डाक्टरों के पास वह गया कि मुर्दों की चीरा – फाड़ी वह लियोनार्दो दा विंची 33 अपनी आंखों से देख सके । इस सबका नतीजा यह हुआ कि मानव शरीर के अंग – अंग का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करनेवाले लियोनार्दो के कितने ही कलापूर्ण रेखाचित्र आज विज्ञान की विरासत बन चुके हैं । के ड्यूक स्फोर्जा को फ्रांस के बादशाह ने पकड़ लिया और कैद में डाल दिया ।

परिणामतः लियोनार्दों का अब कोई अभिभावक न रहा । इस संकटकाल में वेनिस जाकर उसने अपने युद्ध सम्बन्धी आविष्कारों को वहां के अधिकारियों के सम्मुख पेश किया जिनमें गोताखोरों के लिए एक खास किस्म की पोशाक और एक तरह की पनडुब्बी भी थी । ये ईजादें वित्री के उन थोड़े – से आविष्कारों में से हैं जिनका कि उसकी नोट – बुकों में पूरा – पूरा व्यौरा नहीं मिलता ।

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विची का कहना था कि इन्हें बनाने के तरीकों को वह खोलकर पेश नहीं कर रहा क्योंकि उसे डर था कि ” कहीं मनुष्यों की पशुता इनका प्रयोग समुद्र तल में उतरकर संहार के लिए न करने लगे । ” कुछ अरसे के लिए लियोनादों से सारे बोगिया के यहां नक्शाकशी की नौकरी भी करता रहा । बोगिया एक जालिम हाकिम था जिसकी तजवीज सारे इटली को अपने कब्जे में ले आने की थी ; उसने लियोनार्दो को नौकरी दी भी इसी इरादे से थी कि उसे इस बहाने टस्कनी और अम्ब्रिया के सही – सही नक्शे मिल जाएंगे ।

ये नक्शे लियोनार्दो ने – खुद मौकों पर पहुंचकर निरीक्षण के अनन्तर , और इंच इंच जमीन को औज़ारों से मापकर , फिर- तैयार किए थे । 1500 ई ० में , जब उसकी आयु 50 के करीब होने लगी , लियोनार्दो अपनी मातृ भूमि फ्लॉरेंस को लौट आया और अब 6 साल लगातार , यहीं रहा । इसी अरसे में उसने ‘ मोनालीसा ‘ की वह प्रसिद्ध तस्वीर तैयार की जिसकी लुभावनी मुस्कराहट को फ्रांस के लव म्यूजियम में देखकर , आज भी हजारों की आंखों की तरावट मिलती है , और आध्या त्मिक तृप्ति मिलती है ।

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” लियोनार्थी के ही समकालीन अन्य प्रसिद्ध कलाकार – रेफेल तथा माइकेलं जेलो उन्हीं दिनों वैटिकन में , और वैटिकन के सिस्टीन चैपल में , तस्वीरें बना रहे थे । लियोनार्दी भी रोग पहुंचा , किन्तु एक भी आर्डर लेने में असफल रहा ।

लोग लियोनार्दी को नहीं चाहते थे , क्योंकि उसने आदमी के जिस्म को अन्दर से भांका था और अपने उन अध्ययनों की उसने तस्वीरें भी खींची थीं । जनता की , तथा अधिकारी वर्ग की , इस उपेक्षा का परिणाम यह हुआ कि उसे इटली छोड़ना पड़ा और वह लौटकर फिर घर कभी नहीं आया । उसकी जिन्दगी के बचे आखिरी साल फ्रांस के राजा की सेवा में गुजरे । कलाकार लियोनार्दो दा विंची के प्रामाणिक संस्करण निकल चुके हैं ।

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आज भी उसके उन चित्रों में मानव प्रतिभा की अद्भुत अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष है , किन्तु वैज्ञानिक एवं आविष्कारक लियोनार्दो दा विधी का वर्णन कर सकना कुछ टेढ़ी खीर है । वह अपने जमाने से कहीं आगे था । उसने जितनी भी कल्पनाएं की , सभी को मूर्त रूप दिया जा सकता था ; लेकिन अपने ही साथियों से वह इतने दूर की सम्भावनाएं पेश कर रहा था । जिसके लिए समर्थन उसे शायद कहीं भी नहीं मिल सका ।

उसकी एक मुश्किल यह भी थी कि वह एक ही वक्त पर कितने ही काम अपने हाथ में ले लेता और वक्त पर एक भी निभा न पाता क्योंकि वक्त ही थोड़ा होता , और उन सभी पर एक साथ ध्यान वह खुद भी केन्द्रित नहीं कर सकता था । उसके आविष्कार , जितने ही रोचक हैं , उतने ही विविध भी हैं । उसकी मशीन गन स्पेनिश अमेरिकन युद्ध में इस्तेमाल की गई अमेरिकन गंटलिंग गन का पूर्व संस्करण है ।

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लियोनार्दो की गन में एक तिकोने आधार पर रखे बहुत – से बैरल इस्तेमाल होते हैं : एक ग्रुप की गर्ने जब कारतूस छोड़ रही होती हैं तो – दूसरे ग्रुप की भराई हो रही होती है , और तीसरा ग्रुप ठंडा हो रहा होता है । उसका ईजाद किया हुआ मिलिटरी टैंक एक चलता – फिरता घर है जिसमें कारतूसी बीचों की भरी कितनी ही तोपें छिपाकर रखी होती हैं । टैंक चार ऐसे पहियों पर आगे बढ़ता जिन्हें किसी भी दिशा में घुमाया – फिराया जा सके और , ज़रूरत के वक्त , अलग भी किया जा सके ; लेकिन टैंक को आगे धकेलने के लिए आदमी ही काम में लाए जाते ।

यह उन दिनों की बात है जबकि पानी और हवा को शक्ति के रूप में इस्तेमाल करने के अतिरिक्त कोई और कारगर वैज्ञानिक तरीका अभी विकसित नहीं किया जा सका था । पनडुब्बियों और गोताखोरों की पोशाक के अलावा लियोनार्दो ने एक दो – मस्तूल वाला पानी का जहाज भी बनाया : बाहर के मस्तूल को यदि दुश्मन बमबारी से तबाह भी कर दे तो जहाज बाकायदा चलता ही रहेगा ।

विज्ञान के उस क्षेत्र में भी जिसे आधुनिक परिभाषा में यंत्र – विज्ञान कहते हैं । लियोनार्दो का उतना ही प्रवेश था । हवा की रफ्तार को जानने के लिए उसने एक • एनीमोमीटर ईजाद किया । यह एक तरह का पंखा था जिसे बीचोंबीच इस प्रकार से टिका दिया जाता था कि जरा – सी भी हवा उसमे गति उत्पन्न कर जाए : पंखा हवा में किस लियोनार्दो दा विंची 35 कोण पर डुलता है , उससे हवा की रफ्तार बड़ी आसानी से मापी जा सकती है । लियोनार्दो की बड़ी घड़ी ही दुनिया में पहली घड़ी थी जिसमें घंटे और मिनट एक साथ पढ़े जा सकते थे ।

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घड़ी की गतिविधि को नियंत्रित करने के लिए अन्दर एक भार लटका होता और एक तरफ से रेत के खिसकने के लिए एक ‘ ऍस्केपमेण्ट ‘ की व्यवस्था होती । आजकल की मोटरगाड़ियों में एक प्रकार का ऑडोमीटर लगा होता है जो यह बतलाता है कि गाड़ी कितना फासला तय कर चुकी है ।

ऑडोमीटर का काम यह होता है कि पहियों ने कितने चक्कर काटे हैं । उनको बाकायदा दर्ज करता चले और गियरों और कंवलों के जरिए , इस सूचना को मीलों में बदल दे । लियोनार्दो के पास कोई मोटर गाड़ी नहीं थी लेकिन अपनी नक्शाकशी के दौरान फासले मापना उसके लिए भी उतना ही जरूरी था जिसके लिए उसने एक तरह का ऑडोमीटर – सा ईजाद कर लिया : एक ह्वील बैरो की शक्ल की – सी कुछ चीज़ जिसे आपरेटर सड़क पर धकेलता हुआ आगे ले चलता।

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जैसे – जैसे पहिये चलते , मशीन के गियर घूमने लगते , जिनका सम्बन्ध एक डायल की सुइयों के साथ पहले से ही बना हुआ होता । ये सुइयां किसी भी वक्त यह बता सकती थीं कि ह्वील बैरो कितने मील चल चुका है । लियोनार्दो ने कितनी ही इस तरह की छोटी – मोटी ईजादें की जो आज भी , थोड़ी बहुत हेरा – फेरी के साथ , उसी शक्ल में इस्तेमाल हो रही हैं ।

उनमें कुछ फर्क अगर आ गया है तो यही कि लकड़ी की जगह अब स्टील इस्तेमाल होने लगा है किन्तु उनके मूल में काम कर रहे नियम सर्वप्रथम लियोनार्दो की सूक्ष्म बुद्धि ने ही विकसित किए थे । भारी वजनों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने के लिए भी उसने एक यंत्र का निर्माण किया था जो हमारे आधुनिक ‘ ऑटोमोबाइल जंक ‘ से बहुत भिन्न नहीं है ।

एक ‘ वेरियेवल स्पीड ड्राइव ‘ का माडल भी उसकी नोटबुकों में दर्ज है जिसमें गियर की शक्ल के भिन्न भिन्न व्यास वाले पहिये इस्तेमाल होते हैं और इन पहियों का सम्पर्क आप – से – आप एक किस्म के कोन ड्राइव के साथ होता चलता है । इस्तेमाल करनेवाला जैसी भी रफ्तार चाहे इस सम्बन्ध को अदल – बदलकर मुमकिन कर सकता है । और तो और , लियोनार्दो ने रोलर बेयरिंग की ईज़ाद भी उन दिनों कर ली थी जबकि अभी ऐसी किसी चीज का किसीको स्वाब भी न आ सकता था ।

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उसने एक किस्म का डिफरेन्शल भी तैयार कर लिया था जिसका इस्तेमाल मोटरगाड़ियों के पिछले पहियों में सिद्धान्ततः हम आज भी उसी रूप में करते हैं । डिफरेन्शल का काम होता है कि दोनों पहियों में एक की रफ्तार दूसरे से कुछ ज्यादा हो ताकि मोटरगाड़ी को किसी मोड़ पर मोड़ने में कोई दुर्घटना न पेश आए ।

मशीनी औजार तैयार करनेवाली फैक्टरियां शायद यह जानकर आज हैरान हों कि उनकी चूड़ियां काटने की और रेतियां काटने की मशीनें प्रयोग में लियोनार्दो की उन् रूपरेखाओं से कोई बहुत भिन्न नहीं हैं । हाइड्रॉलिक्स , अर्थात् जलशक्ति , लियोनार्दो का एक बहुत ही प्रिय विषय था ।

उसने एक ऐसा पम्प आविष्कृत किया जिसमें प्रवाह की शक्ति स्वयं पानी को ऊपर उठा को आगे सकती थी । बहते पानी में एक पैडल – ह्वील होता जो एक बड़े भारी काग धकेलता , और यह काग – ह्वील अब कुछ पिस्टन पंपों को चालू कर देता जिनसे पानी धीमे घीमे खुद – ब – खुद ऊपर उठने लगता । सारी मशीन कुल मिलाकर कोई 70 फुट ऊंची बन जाती है ।

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इसके अतिरिक्त जलशक्ति के अन्य पाश्र्व का भी विंची ने अध्ययन किया । पानी में तैरती – फिरती मछलियों की शक्लों को उसने बड़े गौर से देखा जिसके आधार पर उसने पानी के जहाजों के कुछ ऐसे डिजाइन बनाए कि वे भी मछलियों की तरह ही आजादी के साथ जिधर चाहें , बगैर किसी रोक – टोक के , आ – जा सकें । – जलशक्ति से सम्बद्ध दो ही प्रश्न महत्त्वपूर्ण थे- एक तो खेतों की सिंचाई का प्रश्न और दूसरा समुद्री यात्रा का प्रश्न ; और इन्हींको लक्ष्य में रखते हुए , लियोनार्दो ने नदी प्रवाह की दिशा को बदल देने की कुछ महान् योजनाएं भी तैयार कीं ।

1490 के लगभग लियोनार्दो ने हवा में उड़ने की एक मशीन का नक्शा भी तैयार कर दिया । इस मशीन को , जो उड़ी कभी नहीं लियोनार्दो की योजना में शुरू से आखीर तक खुद इन्सान को ही चालू करना था । ख्याल था कि उड़नेवाला ही अपने पैरों को चला – चलाकर मशीन के बड़े – बड़े पंखों को गति देगा ! एक किस्म का हेलीकोप्टर भी लियोनार्दो ने तैयार कर लिया था जिसका मुख्य पुर्जा एक भारी स्क्र्यू या चूड़ी था लेकिन इस चूड़ी को आगे – पीछे धकेलने के लिए एक स्पिंग लगा दिया गया ।

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इसमें काम याबी उसे इस वजह से नहीं मिल सकी कि स्क्र्यू को चालू करने के लिए जो ताकत उस वक्त उपलब्ध थी वह बहुत ही थोड़ी थी । लियोनार्दो ने , लकड़ी का , पिरामिड की शक्ल का एक बड़ा ढांचा भी तैयार किया और उसे लिनन से ढंक दिया यह था हमारा पहला पैराशूट जिसकी परीक्षा एक ऊंचे बुर्ज से करके दिखाई भी गई— कि किस प्रकार ऊपर से गिरता हुआ कोई वज़न ज़मीन पर पहुंचते – पहुंचते अपनी रफ्तार को मद्धिम कर सकता है । वनस्पतिशास्त्र में भी लियोनार्दो दा विंची का प्रवेश अद्भुत था ।

उसके रेखा चित्रों में तथा लेखों में स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि वनस्पतियों की प्रकाश ग्रहण की प्रवृत्ति का उसे पूर्ण ज्ञान था — कुछ पौधे स्वभावतः ‘ सूर्यमुखी ‘ होते हैं जबकि कुछ दूसरे सूर्य के उदय होते ही अपना मुंह फेर लेते हैं । यही नहीं , लियोनार्दो ने यह भी प्रत्यक्ष किया कि कुछ जड़ों की प्रवृत्ति ज़मीन के नीचे की ओर बढ़ने की होती है , जबकि दूसरी किस्म की कुछ जड़ें स्वभावतः धरती के बाहर निकलने के लिए जैसे बेचैन रहती हैं ।

वनस्पतियों में , प्रकाश – वृत्ति की भांति , यह ( एक प्रकार की ) ‘ भूमुखी – वृत्ति ‘ भी पाई जाती है— जो भिन्न – भिन्न वनस्पतियों में प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति के रूप में उसी प्रकार दृष्टिगोचर होती हैं । वृक्षों के तने को या शाखाओं को काटें तो हम देखेंगे कि कटी हुई जगह पर कुछ घेरे से पड़े होते हैं । लियोनादों ने इन घेरों का सम्बन्ध वृक्ष की आयु से स्थापित कर लिया । फूलों के जो रेखाचित्र लियोनार्दो पीछे छोड़ गया है , उनसे यह स्पष्ट है कि उसे वनस्पति जीवन में नर – नारी अथवा स्त्री – पुरुष की सत्ता का परिज्ञान था ।

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शरीर के अंगांग तथा अन्तरंग जानने की उत्सुकता भी लियोनार्दो को हुई तो इसके लिए भी उसने एक चिकित्सक के साथ अपना गठबन्धन कर लिया । जहां तक मानव शरीर की रचना का प्रश्न है , उसकी अन्तर्व्यवस्था का लियोनार्दो को गम्भीर ज्ञान था । यह उसके शरीर विषयक रेखाचित्रों से ही स्पष्ट है । इन रेखाचित्रों से यह भी

इतिहास में पहली ही बार ज़ाहिर हो सका कि मनुष्य के मस्तक में तथा जबड़ों में मुखद्वार होते हैं जिन्हें चिकित्साशास्त्री , क्रमशः , ‘ फन्टल ‘ तथा ‘ मॅक्सिलरी ’ साइनस कहते हैं । चिकित्साशास्त्र में लियोनार्दो के रेखाचित्र ही पहली बार रीढ़ के दोहरे झुकाव को ठोक तरह से अंकित कर सके हैं ; और , इतिहास में , पहली ही बार मां के पेट में पड़े ( अ – जात ) शिशु की स्थिति बड़ी सूक्ष्मता के साथ दरशाई गई है ।

लियोनार्दो के हृदय सम्बन्धी रेखा चित्रों तथा उपवर्णनों में भी , अद्भुत यथार्थ अंकित हुआ है जिसमें हृदयकक्ष , हृदयद्वार , तथा हृदय की आपूर्ण रचना सभी कुछ यथावत् चित्रित है । लियोनार्दो के अनेक रेखाचित्रों को आज के माडलों के रूप में परिवर्तित किया जा चुका है ।

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कभी – कभी इन प्रतिमूर्त आकृतियों का प्रदर्शन भी किया जाता है । ‘ इण्टर नेशनल बिजनेस मशीन कॉर्पोरेशन ‘ के पास इनका एक प्रामाणिक एवं विपुल संग्रह है भी । कॉर्पोरेशन के संस्थापक टॉमस जे ० वाट्सन के शब्द है : ” आविष्कार मनुष्य की महानतम कलाओं में एक है । शब्द के व्यापकतम अर्थों में सभी कलाओं का समावेश आविष्कार में हो जाता है ।

जब हम उसके चित्रों , रेखाचित्रों , अन्वेषणों , वैज्ञानिक गवेषणाओं तथा आविष्कारों के माध्यम से करते हैं , तो हमें एक अपूर्व उल्लास का अनुभव होता है कि एक ही मनुष्य अपनी विचारशक्ति , अनुभवशक्ति तथा निर्माण शक्ति का अपने साथी मानवों की सेवा में पूर्णतम प्रयोग करते हुए – क्या कुछ नहीं कर जा सकता । “

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