Galen biography Hindi गैलेन जीवनी हिंदी 2022

Galen biography Hindi:- गैलेन ” इन स्थापनाओं में से किसीपर भी एकाएक विश्वास कर लेना मेरे लिए असंभव है जब तक कि मैं , जहां तक भी मेरी ताकत में है , इनकी परीक्षा खुद नहीं कर लेता । मैं तो कहूंगा कि मेरे बाद भी अगर किसीको मेरी ही तरह कर्मयोगी होने की धुन सवार हो , और सत्य की तह तक पहुंचने की हवस हो , तो वह केवल दो या तीन उदाहरणों से ही जल्दबाजी के साथ किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश न करे । जिज्ञासु को प्रतिबोध , प्राय : मेरी तरह लम्बे अनुभव के बाद ही उपलब्ध होगा ।

” ये शब्द प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री गैलेन के हैं : गलेन- जिसकी गणना विश्व के धन्वन्तरियों में की जाती है और जिसे शरीर – रचना – विज्ञान का जनक माना जाता है । उसकी ‘ एनेटॉमिकल एक्सरसाइजेज ‘ चिकित्साशास्त्र का वह विश्वकोष है जो चिकित्सा को सचमुच एक नये मोड़ पर ले आया- एक कर्मयोगी जीवन का एक जीवित स्मारक , तथा चिकित्सकों के लिए प्रायः 15 सदियों से चला आ रहा ‘ अन्तिम प्रमाण ‘ ।

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गलेन के उद्धृत शब्दों का महत्त्व हमारे लिए आज और भी बढ़ जाता है जब हम उनमें – परीक्षण द्वारा सत्य की परीक्षा करने की आधुनिक प्रणाली की , तथा निष्कर्षों की अनेकानेक परीक्षाओं के सिद्धान्त की प्रतिध्वनि पाते हैं । गंलेन का जन्म ईसा के 129 साल बाद , एशिया माइनर के पर्गेमम द्वीप में हुआ था । एशिया माइनर कालासागर तथा भूमध्यसागर के बीच में स्थित एक प्रायद्वीप है ।

जो वीच में ईजियन सागर द्वारा ग्रीस से विभक्त हो जाता है । अर्वाचीन युग में यह प्राय द्वीप प्राय : टर्की की अधीनता में ही रहा है , किन्तु गैलेन के दिनों में यह सभ्य विश्व के समृद्धतम प्रदेशों में था । तब रोमन राज्य का दबदबा था और रोम ने तब इसका प्रशासन विश्व के महान वैज्ञानिक 28 सचमुच बड़ी बुद्धिमत्ता और सुन्दरता के साथ किया था । गॅलेन का पिता ग्रीक था और सुशिक्षित था ।

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अंकगणित , ज्यामिति तथा ज्योतिर्विज्ञान में उसे निपुणता प्राप्त थी । वह एक गणितज्ञ भी था और वास्तुशिल्पी भी । पिता का पुत्र पर महान तथा निर्णायक प्रभाव पड़ा । उसीके कारण उसकी मनोवृत्ति में , उसके जीवन में , वैज्ञानिकता आई । पिता का उपदेश था : ” सत्य ही की आराधना करनी चाहिए । सुना और सुनकर उसपर चिन्तन किया । किसी भी मत और के अनुसरण की आवश्यकता नहीं ।

” उधर , मां का प्रभाव भी कुछ कम न था । उस धंयं सीखा , खुद पर काबू रखना सीखा , कुछ भी जवान पर लाने से पहल खूब सोचना सीखा । सबक तो मां ने ठीक दिया लेकिन वह खुद एक तुशं – मिजाज औरत थी , नतीजा यह हुआ कि गैलेन ने फैसला कर लिया कि मां का कहना वह कभी नहीं मानेगा । चौदहवें साल तक , जैसा कि उन दिनों विज था . गॅलेन की पढ़ाई – लिखाई घर पर ही हुई । 16 वें साल में उसे विभिन्न शिक्षा केन्द्र में व्याख्यान सुनने भेज दिया गया ताकि वह ग्रीक दार्शनिकों के महावाक्यों का चयन कर सके।

गैलेन जब सत्रह वर्ष का हो गया तब जाकर कहीं निश्चय किया गया कि उसे डाक्टर बनना है ; और आश्चर्य यह है कि बालक की जीवन – दिशा निर्धारित करने के इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का समाधान एक स्वप्न के आधार पर किया गया ! उन दिनों लोगों को स्वप्न की सत्यता पर बहुत ही अधिक विश्वास हुआ करता था , यहां तक कि गैलेन और उसके पिता जैसे सुशिक्षित और सुलभ विचारों के लोग भी उसे तथावत् स्वीकार करते थे।

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चिकित्साशास्त्र का अध्ययन गेलेन ने उन दिनों के माने हुए विशेषज्ञों के जाकर किया । इसके लिए उसे देश – विदेश – पर्गेमम , स्मर्ना , कोरिन्थ तक जाना पड़ा । उन दिनों जितने भी विषय एक विद्यार्थी को पढ़ाए जाते थे— ज्यामिति , ज्योतिविज्ञान , संगीत , भाषाविज्ञान तथा आयुर्वेद — सभी का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय गैलेन ने किया । उनतीस साल तक उनका यह विद्यार्थी जीवन चलता रहा ।

उन दिनों भी यह एक लम्बा अरसा माना जाता था । खैर , वापस घर लौटने पर उसने प्रैक्टिस शुरू कर दी और • इसमें उसे पर्याप्त सफलता भी मिली । उधर रोम से ग्लंडियेटरों की मरहम – पट्टी के लिए । उसके पास बुलावे आने लगे । ‘ ग्लंडियेटर ‘ लोग तलवार हाथ में लेकर एक – दूसरे की जान ले लेने के उद्देश्य से द्वंद्वयुद्ध किया करते थे । यह रोमनों का एक मनपसन्द खेल था ।

किन्तु इन्सान के जिस्म पर चीराफाड़ी पर उन्हें आपत्ति थी ! गैलेन ने अपने पद का फायदा उठाया , और वह वहां भी शल्य चिकित्सा सम्बन्धी अपने अध्ययन बदस्तूर करता रहा । शरीर – रचना – विज्ञान तथा शरीर विज्ञान ( फीजियॉलोजी ) दोनों में ही गलेन ने बड़े महत्त्वपूर्ण और व्यापक अनुसन्धान किए । उसकी उन गवेषणाओं के हजार – हजार • पृष्ठ के 21 विपुलाकार ग्रन्थ सुरक्षित है ।

कानूनन वह मनुष्य के शरीर की रचना का पूरा पूरा अध्ययन नहीं कर सकता था , वह कसर उसने 31 बन्दरों के शारीरिक अध्ययन द्वारा पूरी की । इन ग्रन्थों का पृष्ठ – पृष्ठ गेलेन के सूक्ष्म अन्वीक्षणों का परिचायक है । गलेन ने हृदय संस्थान का अध्ययन किया – उसकी नहों को टटोला , उसको गैलेन 29 पेशियों के बलाबल को प्रत्यक्ष किया , और उसके मुखद्वारों की गतिविधि का साक्ष्य किया ।

खून किस तरह शरीर में दौरा करता है , इस सिद्धान्त पर भी वह लगभग पहुंच ही गया था कि एक गलत अनुमान उसकी उस सारी खोज को ही विकृत कर गया , वह यह कि रक्त हृदय के दक्षिण पार्श्व से किसी प्रकार बीच की दीवार में से रिसकर दूसरी ओर पहुंच जाता है ।

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यही नहीं , मुख्य रक्तवाहिनियों की पहचान भी उसने खूब कर ली थी , किन्तु यह निश्चय वह नहीं कर पाया कि ‘ हृदय से ‘ तथा ‘ हृदय की ओर ‘ — दोनों प्रक्रियाओं को एक करनेवाली वह नियामक ‘ वाहिनी ‘ क्या है । उसका ख्याल था कि ये नीली – नीली और लाल – लाल नसें किसी अज्ञात , अनियमित – वृत्ति द्वारा खून को दिल से बाहर की ओर और फिर वापस दिल ही में ले जाती हैं ।

— नाड़ी – तन्त्र के विषय में भी गैलेन हमारे आधुनिक ज्ञान के बहुत निकट पहुंच गया था । उसने यह अनुभव कर लिया था कि ये नाड़ियां ही होती हैं जो स्वयं , अथवा सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम द्वारा , ऐन्द्रिय प्रत्यक्ष को मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं । पशुओं पर , उनके नाड़ी तन्त्र मेरुदण्ड को जगह – जगह छेदते हुए , उसने अनेक परीक्षण किए और पाया कि किस प्रकार विश्व के महान वैज्ञानिक 30 वह बेचारा बेजुबान जानवर शरीर के कितने ही धर्मों को सही – सही निभाने में निकम्मा हो चुका है । एक मध्यच्छद – स्नायु ( फेनिक नवं ) के ही कट जाने से कितना नुकसान हो सकता है

— इसका भी उसे सही – सही आभास हो चुका था । यही वह नाड़ी है जो श्वास प्रश्वास की प्रक्रिया में फेफड़े के परदे की गतिविधि को नियमित किया करती है ।

यह पहचान भी गॅलेन को हो चुकी थी कि नब्ज की रफ्तार किस प्रकार मरीज की हालत के बारे में सही – सही खबर देती रहती है , और यह भी कि यही नाड़ी – स्पन्दन व्यक्ति की आन्तर स्थिति का , भाव – भूमि का परिचायक भी हो सकता है । मैण्डेल के प्रजनन – सिद्धान्तों का पूर्वज्ञान भी जैसे उसे हो चुका था क्योंकि उसने भी प्रत्यक्ष किया था कि बच्चे शक्ल – सूरत में अक्सर मां – बाप से नहीं , दादा – दादी से अधिक मिलते हैं । और उसने भी देखा कि पसीने की हालत में , भले ही हमें यह अनुभव न हो रहा हो , हमारा यह सारा शरीर ही पानी – पानी हो रहा होता है ।

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1500 साल से अधिक गुजर गए किन्तु चिकित्सा जगत् की यह धारणा बनी ही रही कि गैलेन के सिद्धान्तों में कोई त्रुटि नहीं हो सकती ।

किसी एकाध ने यदि उनपर आपत्ति की तो उसका अर्थ होता – अब उनकी न कोई मरीज़ सुनेगा न कोई सहयोगी वैद्य ही । और यह तब जबकि गैलेन का खुद आदेश है कि बिना परीक्षा के किसी भी निष्कर्ष को आंख मूंदकर कभी स्वीकार न करना । 16 वीं सदी में बेल्जियम के एक डाक्टर आन्द्रेआस वैसेलिअस ने मानव शरीर के अंगांग – सन्धान के सम्बन्ध में अनेक परीक्षण किए और गैलेन की प्रामाणिकता को किंचित् विचलित करने की कोशिश की ।

किन्तु एक सदी और बीत गई , जब विलियम हार्वे ने आकर रक्त प्रवाह के सम्बन्ध में अपने परीक्षणों को प्रकाशित किया , तब जाकर कहीं चिकित्सा के क्षेत्रों से गैलेन का प्रभाव कुछ हटना शुरू हुआ । वैसेलिअस के समय में तो – शरीर – तन्त्र विषयक कोई अनुसन्धान यदि यह संकेत देता प्रतीत होता कि गैलेन में कहीं गलती रह गई है , तो चिकित्सा के महारथी यही कह देते कि हमारा यह शरीर ही गैलेन के वक्त से बदल चुका होना है ; गैलेन गलती नहीं कर सकता !

बुद्धि की यह दासता , स्वयं उसके अपने ही ग्रन्थों के प्रति यह क्यों न हो , गैलेन को कभी मंजूर न होती । उसने तो कहा था , ” हर चीज़ की सच्ची कसौटी प्रत्यक्ष है , स्वानुभव है । “

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Manshu Sinha

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