E. C. George Sudarshan Biography in Hindi- जॉर्ज सुदर्शन 2022

E. C. George Sudarshan Biography in Hindi:- ई . सी . जी . सुदर्शन का पूरा नाम एनकल चंडी जार्ज सुदर्शन है । उनका जन्म 16 सितंबर 1931 को केरल के कोट्टायम नगर में हुआ । उनकी गिनती भारत के अग्रणीय भौतिकविदों में की जाती है । उनके पिता का नाम एरिनाक्कल चंडी था ।

यद्यपि बचपन से ही गणित में उनकी विशेष रुचि रही थी किंतु किशोरावस्था में वह विज्ञान की ओर आकर्षित होने लगे थे । विज्ञान की घटनाएं पढ़कर उनमें विज्ञान के प्रति जिज्ञासा बढ़ने लगी थी । प्रारंभिक शिक्षा उनकी प्रारंभिक शिक्षा कोट्टायम के स्थानीय विद्यालय में ही हुई ।

E. C. George Sudarshan Biography in Hindi

प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने 1952 में मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज से एम . एस . सी . की डिग्री प्राप्त की । इस बीच उन्हें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से नौकरी का निमंत्रण आया जो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । इसी संस्थान में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी वुल्फगांग पाउली , पी . ए . एम . दिराक तथा मारिया गिपर्ट मायर से हुई । इन महान वैज्ञानिकों के निर्देशन व मार्गदर्शन में ही वह संस्थान में शोध करने लगे ।

तत्पश्चात वे उच्च शिक्षा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए । यहां उन्होंने रॉचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रॉबर्ट ई मार्शाक के मार्गदर्शन में शोध कार्य किए और 1958 में कण सिद्धांत में पी – एच . डी . उपाधि प्राप्त की , जिसमें टेक्योन्स कणों पर विशेष अध्ययन किया गया था ।

प्रमुख शोधकार्य सुदर्शन ने टाटा इंस्टीट्यूट के अलावा अमेरिका की कई प्रयोगशालाओं में भी शोध किए । उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध खोज ” टेक्योन्स कणों ” की खोज है जो कि प्रकाश की गति से भी तेज चलते हैं । उन्होंने नाभिक्य के अंदर के कणों के मध्य कमजोर शक्तियों की उत्पत्ति के सिद्धांत का भी प्रतिपादन किया ।

E. C. George Sudarshan Biography in Hindi

आज विश्व में इस सिद्धांत को व्यापक रूप से मान लिया गया है । इसी सिद्धांत ने सुदर्शन को सर्वाधिक प्रसिद्धि प्रदान की । साथ ही उन्होंने ‘ क्वांटम जीनो विरोधाभास ‘ का प्रतिपादन किया । मुख्य रूप से ये सभी सिद्धांत उनकी रहस्यवाद के प्रति रुचि का परिणाम थे , जिनके प्रति वह सदा से ही आकर्षित रहे ।

कण सिद्धांत विशेषज्ञ उनको ‘ कण सिद्धांत का विशेषज्ञ ‘ माना जाता है । उन्होंने रॉचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रो . मार्शाक के साथ मिलकर नाभिक्य के भीतर के कणों के मध्य कमजोर शक्तियों की उत्पत्ति के साथ – साथ दूरी समय सरंचना की खोज की । उनकी यह खोज ‘ लॉ ऑफ यूनिवर्सल वेक्टर ऑक्सियल ‘ नामक पुस्तक में संकलित है ।

जबकि जॉर्डन तथा क्यूरी के साथ उन्होंने ‘ सापेक्षिकत्व हेमिल्टनवादी प्रणाली के लिए अपारस्परिक सिद्धांत ‘ का प्रतिपादन किया । उन्होंने ‘ क्वांटम ऑप्टिक्स ‘ में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा ‘ मास्टर विश्लेषणात्मक प्रतिनिधित्व ‘ के सिद्धांत में भी उल्लेखनीय कार्य किया ।

इनके अलावा उन्होंने क्वाटंम क्षेत्र सिद्धांत , प्राथमिक कणों , उच्च ऊर्जा भौतिक , क्लास्किल मेकेनिक्स , क्वाटंम आप्टिक्स , लाई अंकगणित तथा कण भौतिक विषयों पर भी उल्लेखनीय योगदान दिया । उनके द्वारा लिखित लगभग 200 वैज्ञानिक शोध पत्र भारत व विदेशों के वैज्ञानिक जर्नलों में प्रकाशित व्यावसायिक कैरियर डॉ . सुदर्शन ने अपने कैरियर की शुरुआत मद्रास के क्रिश्चियन कालेज से की ।

वह 1959 में यहां लेक्चरर के पद पर नियुक्त हुए । तत्पश्चात वह टाटा इंस्टीट्यूट में रिसर्च वैज्ञानिक के रूप में नियुक्त किए गए और फिर अमेरिका स्थित रॉचेस्टर विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्य करते रहे । उन्होंने 1959 से 1964 के बीच इन तीन संस्थाओं में कार्य किया ।

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यहां शोध करते हुए उन्होंने पी . एच . डी . की शिक्षा पूरी की । इसी बीच वह 1961 में मद्रास के इंस्टीट्यूट ऑफ मैथेमेटिकल साइंस में अतिथि प्रोफेसर भी रहे और 1963-64 में बर्न में अतिथि प्रोफेसर के रूप में कार्य करते रहे । 1964 में उन्हें अमेरिका के सिराक्यूज विश्वविद्यालय का प्रोफेसर तथा निदेशक बना दिया गया ।

1969 तक कार्य करने के बाद उन्होंने इसी वर्ष टेक्सास विश्वविद्यालय में ‘ सेंटर फॉर पार्टिकल्स थ्योरी ‘ के प्रोफेसर व निदेशक का पदभार संभाला । इस बीच 1964 में वह ब्रान्डिस में भी विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते रहे और शिक्षण कार्य करते रहे । 1967 में अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बेरुत में भी विजिटिंग लेक्चरर के रूप 1969 में टेक्सास विश्वविद्यालय के बाद वह स्वदेश चले आए और यहां पर ही अध्यापन कार्य करने लगे ।

उन्होंने 1970 से 1971 तक मद्रास विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य किया । 1971 में वह भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र , मुंबई में भी विजिटिंग प्रोफेसर बनकर पढ़ाते रहे । 1972 में उन्हें सेंटर फॉर थ्योरिटिकल स्टडीज का प्रोफेसर व निदेशक बनाया गया ।

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यह सेंटर बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के अंतर्गत स्थित व कार्यरत है । फेलोशिप व सदस्यता डॉ . सुदर्शन विश्व की कई संस्थाओं के फेलों व सदस्य बनें । 1972 में उन्हें भारत की इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी ने अपना फेलो मनोनीत किया । इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस ने 1963 में उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया । इससे पूर्व 1962 में अमेरिकन फिजिक्स सोसायटी ने उन्हें अपनी फेलोशिप प्रदान की थी ।

सम्मान व पुरस्कार

डॉ . सुदर्शन को 1970 में सी . वी . रमन सम्मान , 1977 में बोस पदक , 1985 में टी . डब्लू . ए . एस . सम्मान प्रदान किया । भारत सरकार ने 1976 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया । 1966 में विंस्कांसिन विश्वविद्यालय तथा 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डी . एस . सी . की मानद उपाधि देकर सम्मानित किया ।

Manshu Sinha

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